ये कैसा सन्नाटा है, ये कैसी तन्हाई है ..??
कोई तो आशिक रोया है यहाँ,
ये कयामत तो दिल टूटने से आयी है.......
Saturday, 25 July 2020
कयामत
Wednesday, 11 March 2020
तुम जरा देर से ही आना....
याद आया है मुझे तुम्हारा वो मुस्कुराना
मुस्कुराकर हल्के से नज़रों को झुकाना
अपने चेहरे पर आते बालों को
एक अदा दिखाकर पीछे हटाना....
क्या खूब खोया हूँ तुम्हारी यादों के झरोखों में
तुम्हारी हाँ - ना के बीच के अपने ही धोखो में..
अब तो तुम मुझे ना ही असलियत दिखाना
बस यूँ ही मेरी यादों में मेरे लिए मुस्कुराना,
सुनो.. ऐसा करो.. तुम जरा देर से ही आना... I I
Sunday, 16 June 2019
हमारे घरोंदे
कैसा अजीब ये वक़्त कैसा बेबाक है
रात भी पूरी खत्म नहीं और सुबह भी होने को बेकरार है,
सुर्ख नहीं हैं पत्ते इन चंद दिखते पेड़ों पर
जबकि मौसम में तो बड़ी ज्वाला की मार है..
प्रकृति ने बेइंतहा कोशिश कर ली है खुद के वजूद को बचाने में,
हमने भी लेकिन पूरा घमासान किया है हर सुंदर संपदा हटाने में,
पूरी तरह बर्बाद कर दिया हमने अपने ही घरोंदों को, ना प्रश्न करना अब प्राकृतिक आपदाओं के हमें मिटाने में..!!
सब हमारा अपना ही बोया है और अब हम ही इन कांटो को झेलेगे,
हमारे आने वाली पीढ़ी के बच्चे अब कहाँ हरियाली और प्रकृति की गोद मे खेलेंगे??
Sunday, 10 February 2019
मै रात से नहीं डरता हूँ..!!
ना इन सन्नाटो से ना इस अंधकार से डरता हूँ,
ना इस झूठे समाज के बहिष्कार से डरता हूँ,
ना डरता हूँ मैं कल के उस अज्ञात निर्णय से..
मै तो बस अपने अंदर की आवाज से डरता हूँ..!!
(आदी)
(Adee)
Wednesday, 3 October 2018
सारांश
नहीं है जो हकीकत, उसकी तलाश हूँ मै
बेकार सा जो था वीराने मे, तराश रहा हूँ मै,
मत आंको मुझे सिर्फ जो देखा उतने से मुझे
एक उफनते सागर का सारांश हूँ मैं!!
Saturday, 29 September 2018
सन्नाटो की आवाज में
निकलता हूँ इन गलियों में
दूर तक कोई हमसफर नहीं दिखता
मै होता हूँ और घना सन्नाटा होता है,
मुझे खुद मेरा अस्तित्व नहीं दिखता!!
खोज रहा हूँ कुछ ऐसा मैं
जो शायद कहीं छुप गया है गुमनाम होकर
वो भी आस लगाए बैठा है
मिलूंगा तो सिर्फ चैन, सुकून और आराम खोकर!!
Thursday, 26 July 2018
रूम, फ्लैट और घर
सन 2011 था जब मैं दिल्ली पढ़ने आया,
उस समय एक कमरा लिया , 5000 के करीब था उसका किराया ।
साल दो साल नही पूरे 6 साल वहां गुजारे
पर जब भी किसी को बुलाया मेरे "रूम" पर आना सिर्फ ये कह पाया"।।
सोचा अभी तो कॉलेज का लड़कपन है ,
और मेरे दोस्त यार भी क्या कुछ कम हैं ?
हाँ फिर मैं और बड़ा हो गया....
डिग्री डिप्लोमा तो क्या मेरा मास्टर्स भी खत्म हो गया ।
फिर सोचा क्यों न अब रूम को छोड़ा जाए ,
अपने जिंदगी के रुख़ को "घर" शब्द की ओर मोड़ा जाए।
यही सोचकर मैने जगह को बदल लिया ,
एक कि बजाय अब दो कमरों का किराया दिया ।
पर अब भी मैं उस शब्द को न पा पाया,
अब भी मैने सबको "फ्लैट" पर ही बुलाया घर ना बुला पाया ।
घर तो होता है उसमें रहने वालों से, एक पूरे परिवार से,
ये नही बनता पैसों से, बातों से या सिर्फ सपनो के साकार से...।।
Friday, 29 June 2018
बड़ा कमरा
इतने साल बाहर रहा और मैने क्या पाया
हाँ था घर छोटा सा पर सुकून भरा, मैं छोड़ आया
दर दर भटका और कुछ पैसे भी कमाए
सब कुछ नया लिया बस वो रिश्ते न जोड़ पाया ..
सब कुछ नया लिया बस वो रिश्ते न जोड़ पाया ..।।
Tuesday, 26 June 2018
चाय
रात खत्म होने को हो
और सुबह की पहली किरण का उजाला हो
थोड़ा सा सन्नाटा , ठंडी हवा हो
और एक चाय का प्याला हो.....
Saturday, 9 June 2018
रात और ख्याल
ख्याल वो जो सारी रात मेरी नींदों से टकरा रहा था,
कभी मैं सपनों के करीब था कभी सिर्फ सपने सजा रहा था ।
करवटे बदलना कभी तकिये को सीने से लगाना,
अब बस ऐसा करना मेरी रातों का काम हुआ जा रहा था ।।
बस अब छोटी सी हो गयी थी वो लंबी रातें,
और.....
किसी कहानी के बेचैन मोड़ सा मैं जिये जा रहा था,
किसी कहानी के बेचैन मोड़ से मैं जिये जा रहा था।।
Sunday, 18 March 2018
निर्माण स्वयं का
रिश्ते निभाने के लिए होते हैं, यह कोई रण भूमि नही है जहां अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया जाए। आज के नव युग मे हमारी तकनीक जितनी गतिमान हो रही है हमारा आपसी व्यक्तिगत संचार तथा भावों का आवागमन छीण होता जा रहा।। हम अपने भौतिक व्यक्तित्वों का तो विकास कर रहे परंतु अपनी असल पहचान तथा छवि को घुमिल कर चुके हैं। आज हम चाहते है जब खुद को टटोलना , अपने आंतरिक मस्तिष्क तथा हृदय की गहराई को तो वहां निर्वात के सिवा और कुछ नही और जो कर रहा है बेचैन दिन प्रतिदिन हमारे जीवन को वह तो बाह्य उलझनों का वह बगीचा है जो प्रारम्भ में आकर्षक और मोहक लगता है, जिसमे स्वयं जकड़े पड़े हैं हम क्योंकि बीच मे पहुंचने पर अंधकार व्याप्त है ।।
निकलने का पथ सीधा है क्योंकि निर्माण तो स्वयं हमें ही करना है, आवश्यकता है तो बस प्रारंभ की।। बाहर तो दूर तक प्रकाश है , उतना ही जितना हमारे अंदर भी व्याप्त है बस वह भी ओझल है हमारी दृष्टि से उन जंगलों के कारण.. जिनसे निकास का द्वार हम स्वयं बनाएंगे।।
(आदी)
Tuesday, 20 February 2018
मैं बस लिखता हूँ ..
अपने शब्दों के आकार के लिए लिखता हूँ,
कुछ अनकहे सपनो के साकार के लिए लिखता हूँ।
रह ना जाये कोई कमी मेरे अल्फ़ाज़ में,
है जो दिल के अंदर उन जज़्बात के लिए लिखता हूँ।।
कभी खुद के सम्मान के लिए लिखता हूँ,
कभी उनकी यादों के गुलिस्तान के लिए लिखता हूँ।
भर जाता है समंदर भावों का जब अंदर,
तब मैं उस प्यासी जमीं के अरमान के लिए लिखता हूँ।।
मैं तो हूँ एक बहता हुआ दरिया
कभी इस पार से लिखता हूँ कभी उस पार की लिखता हूँ......।।
Wednesday, 7 February 2018
बेचैनी
कितना अच्छा होता है बेकरार होने पर भी कहीं खो जाना,
कितना अच्छा होता है बेचैन रात मे भी सो जाना,
यूं तो बेसब्र बेदर्दी भरी है ये जिंदगी..
कितना अच्छा होता है दिल भरने पर बेधड़क रो जाना।।
(आदी)
Wednesday, 24 January 2018
जज्बातों की कहानी
ता उम्र छुपाया उन जज्बातो को,
सब कुछ दिल की गहराई मे दफना दिया।
सोचा खाली कर दूँ खुद को लिखकर कहानी
हर शब्द उसके लिए हैं उसनें ये भी पहचान लिया।।
【आदी】
Monday, 18 December 2017
इश्क़ सरेआम
कुछ इस कदर मैंने खुद को उसके नाम कर दिया
हाथ को पकड़ा उसके और मोहब्बत को सरेआम कर दिया,
मेरा इश्क़ तो एकदम सच्चा था फिर भी
उसने बोला की मैने उसे बदनाम कर दिया....।।
Monday, 11 December 2017
नासमझ ही अच्छा था....
काश मुझमें ये समझ ही न होती,
मैं तो बस नासमझ ही अच्छा था..
ये दुनिया के कायदे, रीति-रिवाज
झूठे चेहरे, वादों से दूर ही अच्छा था..।।
(आदी)
Tuesday, 21 November 2017
बेपरवाह
बेहतरीन बेपरवाह जिंदगी थी
फिर परवाह न होने की परवाह हो गयी..
उन्मुक्त उड़ान तो अच्छी थी
फिर किसी क़ैद की चिन्ता हो गयी..।।
Sunday, 9 July 2017
अंधों का शहर
खुली हैं ये ऑंखें या धुएं से घुली हैं......'
रोज़ गुफ्त्त्गु होती है हैवानियत से तुम्हारी,
इंसानियत क्या मुर्दों से तुली है...?
इस मंजर को भी अपना लिया हमने ऐ आदी
हवा ही जोरो की कुछ उलटी चली है......
खून का एक कतरा भी काफी था झकझोर देने को,
शांत कैसे आज जब लाल पूरी ये जमीं है ......?